हज़रतगंज की शाम….?

तुमने जवाब नहीं दिया अक्षत , मैं क्या समझूं -मीरा 

यार तुम इतनी गंभीर क्यों हो जाती हो -अक्षत 

ये तुम पूछ रहे हो अक्षत -मीरा 

ज़ाहिर है हम आप से ही मुख़ातिब हैं ~अक्षत 

पर शायद मैं जिस अक्षत से मुख़ातिब थी वो तुम नहीं हो ~ मीरा के लहज़े में अब मायूसी से कहीँ अधिक बेबाक़ी थी 

दोस्त ये सब डायलॉग मेरा है , तुम मेरा क़िरदार मत निभाओ , अच्छा से नक़ल भी नहीं उतार पा रही -अक्षत 

क्यूँ , बुरा लग रहा है तुम्हें  -मीरा 

हाँ, इतना ख़राब अभिनय जो कर रही हो -अक्षत 

देखा अक्षत , जब हम अपनी प्रवित्ति से हटकर कोई काम करना चाहते हैं क्यों अपनों को ही पसंद नहीं आता जो अक़्सर ‘हमें ‘ समझने का दावा करते रहते हैं ।~ मीरा 

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