हज़रतगंज की शाम ~

मतलब मैं समझा नहीं …-इस बार अक्षत की नज़रे सवालिया थी
अभी थोड़ी देर पहले जो तुमने कहा क्या वास्तव में तुम ऐसे ही रहना चाहते हो -मीरा
नहीं    …..इंसान है ‘ बदलाव ‘ तो उसकी प्रवित्ति है , सो एकरसता तुम्हें भी तो अच्छी नहीं लगेगी – अक्षत नहीं  , बिल्कुल नहीं तभी तो तुम्हारा अभिनय कर रही थी ~मीरा ने तीखी मुस्कान बिखेरते हुए कहा
तो फिर सही है न दिक्कत क्या है – अक्षत
नहीं दिक्कत कोई भी नहीं , महज़ द्वन्द है -मीरा
कैसा द्वन्द – अक्षत
क्या तुम इस बदलाव को उतने ही सहजता से स्वीकार्य कर लोगे जितने की हमारे प्यार को कर लिया था -मीरा
तुम पूछना क्या चाह रही हो …-अक्षत
वही जिसे तुम समझने से कतराते रहे हो ~मीरा
आज तो तुम महाभारत के अर्जुन की भांति प्रश्न कर रही , देखो जिसे तुम प्यार के रही हो ,उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहता । बस इतना ही कहूंगा कि एक mutual understanding रहे तो हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा ,
To be continue
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