‘ हज़रतगंज की शाम ‘


~ आज तो तुम महाभारत के अर्जुन की भांति प्रश्न कर रही , देखो जिसे तुम प्यार के रही हो ,उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहता । बस इतना ही कहूंगा कि एक mutual understanding रहे तो हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा , 

और अगर मैं पुछू की वो understanding mutual कैसे रहेगी तो तुम्हारा क्या जवाब होगा -मीरा 

“एहसासों के जरिये …मीरा” -अक्षत 

नहीं  , मैं एहसासों की पराकष्ठा यानी प्रेम की बात कर रही हूं । एक बुनयादी फर्क है ‘प्रेम और एहसास में ‘~ मीरा  

अच्छा , फिलोसोफिकल साहब तो बताएं क्या फर्क है ~अक्षत 

यही कि ‘एहसास ‘ हमारे मानवीय पहलु को प्रदर्शित करता है जो की एक ठहराव के बाद पनपता है , जबकि प्रेम उस एहसास का भावनात्मक पक्ष बनकर रह जाता है ~ मीरा 

नहीं नहीं रुको , तुम misunderstand कर रही हो , 

         प्रेम के मायने महज़ भोग-विलास नहीं   बल्कि जिसे तुम ‘एहसास ‘ का भावनात्मक पक्ष बता रही हो वो बग़ैर समर्पण के संभव नहीं है ~अक्षत

Sex को लेकर तुम इतने prejudice क्यों हो , स्त्री-पुरुष के यौवन के श्रृंगार का एक आवश्यक संसाधन है ये , तुम तो ऐसा मत कहो ….~मीरा 

नहीं मीरा, ये संसाधन कब आशक्ति में तब्दील हो जाये कह नहीं सकते ~अक्षत

फिर तो ये हमारी कमज़ोरी हुई न , कहाँ तुम समर्पण की बात करते हो और कहाँ इस श्रृंगार प्रसाधन मात्र से डरते हो । ये तो कायरता है   ~मीरा

हाँ , क्योंकि हम इंसान हैं भगवान बुद्ध नहीं मीरा -अक्षत 

हम्म्म्म ….. ये अच्छा लगेगा की मैं तुम्हें इतिहास बताऊँ , भगवान बुद्धा ने भी श्रृंगार प्रसाधन को अपनाया था ~मीरा 

भूल रही पर तब वे भगवान बुद्धा नहीं थे सिद्धार्थ गौतम थे ~अक्षत 

ख़ैर मैं इस बहस मेँ अभी जाना नहीं चाहती ,तुमने कहा न मैं इंसान हूँ भगवान् बुद्ध नहीं तो फिर हमेँ तो इंसान ही चाहिए अक्षत वैसे भी भगवान् के लिए भक्ति करने की क्षमता हमारी नहीं ।

                                         और जानते हो जिस ‘Sexuality ‘ को लेकर तुम घृणा की नज़र से देख रहे हो दरअसल वो तुम्हारी ‘कमज़ोरी ‘ और नासमझी है 

    कमजोरी इस लिहाज से की तुम जब साधारण इंसान जैसा समर्पण नहीं कर सकते तो फिर तुम्हारे लिए ‘एहसास ‘ और ‘समर्पण ‘जैसे शब्द खोखले लगने लगेंगे 

        और नासमझी इसलिए की सम्भोग हमारे शरीर के मिलन  की स्वाभाविक परिणति है , जिसकी जरुरत हमारे शरीर को रहती है आत्मा को हो या न हो , और फिर ये एक दूसरे के होने के एहसास की अभिव्यक्ति है जो शायद हमें हर तरीक़े से पूरक बनायेगी और हम इसमे किसी के खिलाफ कहाँ जा रहे हैं । ~मीरा

पर यही एकमात्र एहसासों की अभिव्यक्ति का माध्यम तो नहीं न मीरा ~अक्षत 

ऐसा मैंने कब कहा , पर ये भी एक माध्यम बने तो इसमें हर्ज़ क्या है ~मीरा 

बात तो सही है पर कहीं इस श्रृंगार प्रसाधन के चलते हम इसे खो न बैठे मीरा ~अक्षत 

यही तो फ़र्क है अक्षत एक शारीरिक मांसलता में खोए व्यक्ति मेँ और प्रेम मेँ डूबे व्यक्ति मेँ ,

                                   दरअसल जिसे हम आशक्ति समझते हैं वो वासना के अधीन होती है क्योंकि प्रेम में अधीन कुछ नहीं रहता इसमें तो सब कुछ त्याग और समर्पण के पराधीन हो जाते हैं । ~ मीरा

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2 विचार “   ‘ हज़रतगंज की शाम ‘&rdquo पर;

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