शहर… कुछ आपका ,कुछ हमारा


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वैसे एक बात तो है चाचा आपके औऱ शहर में
कुछ ख़ास फर्क नहीं , अब देखिए न हम उतना ही शहर से मुतासिर हैं , जितना कि आपसे – कल्लू मियां

करीम चाचा दूर सड़क पार राहगीरों की तरफ देखते हुए अचानक कल्लू मियां की तरफ नज़रे घुमाई और बेख़याली से बस देखते ही रहे ,
मानो उनकी आँखें कह रही हो , नहीं कल्लू मियां इस शहर की उम्र में अभी कई बसंत बाकी है ,जबकि मैं तो उस दहलीज़ पर हूँ जहाँ आकर अक़्सर लोग बसंत गिनना छोड़ देते है ।

मियां आज मिशिर गुरु दिखाई नहीं दे रहे हैं -करीम चाचा
लो नाम लिए नही की हाज़िर – कल्लू मियां

का..हो करीम , साले अभी जीयत (ज़िन्दा ) ही हो तुम ~मिश्रा जी

अरे मिशिर तुमको हियाँ धरती पर अकेले कैसे छोड़ चल देंगे ,साथ ही चलेंगे – करीम चाचा

ई राम नाम के बेला में ही आप सब शुरू हो गए – कल्लू मियां

कहो करीम शुरू होने का भी कौनो बखत होत है का -मिश्रा जी

नहीं नहीं मिशिर , शुरू से याद आया काल की कविता तो रह ही गयी थी -करीम चाचा

लो हो गया कल्याण , अच्छा अब सुनाई डालो कुछ शहर के बारे में था न -मिश्र जी

हाँ चाचा और शहर में कुछ ख़ास फरक थोड़े है – कल्लू

चुप ससुर कविता सुनो खीस न निपोरो – मिशिर गुरु ने डाँटते हुए बोला

तो सुनो कविता कल के आगे से ~

हाँ चाहे मिश्रा जी की गली हो , या हक़ीम बाबा की नली ।
या फिर मंदिर के पीछे वाले सुनसान रास्ते पर खड़ी फुलझड़ी ।
सब के सब अपने हिस्से के शहर को बयां कर रहे होते है ।

बस गुरु इतना ही -करीम चाचा
गुरु मज़ा नहीं आया -मिश्र जी

#yqbaba#yqdidi#शहर#

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