‘अनोखा~रिश्ता ‘


~

देख तो दरवाज़े पे कौन है बोल पापा नहीं है ~ऑन्टी

देखती हूँ , वैसे लग रहा है भईया हैं ~पूजा

अरे महारानी विक्टोरिया मैं हूँ , मनमोहन सिंह नहीं आएंगे ~अक्षत

मैं बोल रही थी न , वही होंगें । अब तो मुश्किल है दरवाज़ा खोलना ~ पूजा

खोल दो , वार्ना मैं यहीं ‘ कट गइल धनवा के बाली हो ‘ गाने लगूँगा ~ अक्षत

देख लो मम्मी इनको , अब तो खुल चुका दरवाज़ा ~ पूजा

खोल दे , वैसे तो पूछती रहती है आने पर झगड़ा करती है ~आंटी

नहीं मैं नहीं खोलूँगी ,जाने दो ~पूजा

कोई नहीं मैं जा रहा , रहने दे ~अक्षत

चले गए क्या सच में , देखती हूँ ~ पूजा

ये लड़की भी न , बिना परेशान किये चैन नहीं मिलता न तुझे , और फिर कहती है कि झगड़ा करते हैं जा बुला के ला ~ ऑन्टी

भैया कहाँ है…. अच्छा छुपये मत ,अब कुछ नहीं बोलूंगी , आ जाइये ~ पूजा

चल इतने प्यार से बुला रही तो आ जाता हूँ , अब मना भी तो नहीं कर सकता तुझे ~ अक्षत ने छत से उतरते हुए कहा

पूजा भी उसके उतरने तक बस देखे जा रही थी , पर इस बार शायद बस यूं देखना भर न था ,एक पल को आकर दोनों बस ठहर से गये

पूजा चले गए क्या , कहा रह गयी ~ ऑन्टी की आवाज़ ने दोनों की नजरें को तितर बितर किया ।

अक़्सर रिश्तों में यही होता है जहाँ पर हमारे अल्फ़ाज़ कुछ कह नहीं पाते , वहाँ हमारी खामोशियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं ।

#yqbaba#yqdidi#अनोख~रिश्ता#

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