शहर… कुछ आपका , कुछ हमारा


~
का रे कलुआ तुझे आज दुकान नहीं खोलनी का ~माई (माँ )
खोलनी है न माई , अभी दुकान का बखत कहाँ हुआ है ।~ कल्लू भाईजान

शहर में कौनों (कउनो ) बखत नाही होत है , जब ग्राहक आ गया , समझो तबै से बखत शुरू होगल । समझा~माई

हाँ माई , अब तोर तरज़ूरब के आगे हमार कहाँ बस चलत है ~कल्लू भाई जान ने सोचते हुए बोला( काश माई समझ पाती की , अब शहर पहिले जइसन ना रहल । अब त गिनल चुनल लोग ही दुकान पे आवेन )

देख त करीम चाचा भी आवत ही होइहैं ~ माई
हाँ माई उनही से त बोहनी शुरू होला , काहे की करीम चाचा भी हमरै बाट जोहत रहन ~कल्लू भाईजान

अइसन न कहै के , सब कर बखत होला रे बबुआ ।

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