तवायफ़…! 


~
बहुत दिलफ़रेब हो न तुम ,
कभी ज़िस्म के तो कभी हुस्न के
इक मुक़म्मल ज़वानी के शेर हो तुम ।

हम तो रखते थे अपना ज़िस्म भी ,
बाज़ार में अपना ईमान समझकर
पर एक तुम हो जो अपना ईमान भी
न रख पाए इस ज़वानी में। हमें तलबगार समझकर ।

यही इक फर्क है मुझमें औऱ तुममें कि
कह देते हो वेश्या बड़े आसानी से
भरे बाजार में हमें अपना नक़ाब भूलकर ।

बड़े सलीक़े से सुन लेते हैं हम तुमको भी ,
की कल फ़िर लौट आओगे तुम इसी दरख़्त पर ,
इसे हमारा धरम और ईमान समझकर |

#yqbaba#yqdidi#yqbhaijaan#तवायफ़#

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