‘ अनोखे~रिश्ते ‘


~ ‘हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो |

होंठ कुछ कहते नहीं, काँपते होंठों पे मगर
कितने ख़ामोश से अफ़साने रुके रहते हैं
सिर्फ़ एहसास…|

तभी तो अक़्सर पूजा की ज़िद पर अक्षत साथ मे बैठ ये गीत सुनते , हालांकि शुरू में अक्षत को कुछ अटपटा जरूर लगता पर , अब तो आदत हो गयी थी उनदोनो की कभी ‘मज़रूह सुल्तानपुरी’ तो कभी फैज़ अहमद फैज़ ..।

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