हज़रतगंज की शाम …!


~
‘ हज़रतगंज की शाम ‘

चाचा इन्हें चाय औऱ बिस्किट , टोस्ट जो भी हो देना ज़रा
~ अक्षत ने उस नन्ही मुस्कान से नज़रें मिलाते हुए बोला

औऱ जैसे ही उसकी नज़रें उस नन्ही सी जान पे पड़ी , वो खिलखिला उठी ।वहीं अक्षत जो अबतक थकान और असमंजस से भरा पड़ा था , एक पल को सबकुछ गायब हो गया था , उस नन्ही सी जान की मुस्कान में ऐसा डूब गया मानो अब उसे किसी और कि दरकार नहीं ।

दे दिया भैया , आप भी कुछ लेंगे चाय के साथ ~ चाय वाले भैया ने आवाज़ लगाई तो , उसका ध्यान टूटा

हाँ , एक-आध बिस्किट हमें भी दे दो ~ अक्षत

ठीक है , एक बात कहें भैया मुन्नी की नजरें आप से हट नहीं रहीं है ~ चाय वाले भैया ने नन्ही मुस्कान की तरफ देखते हुए बोला

हां , बिल्कुल सही कहा बड़ी क्यूट जो है ~अक्षत

अभी उनके दिलचस्प बातों का सिलसिला चल ही रहा था कि , अक्षत के फ़ोन पे मैसेज वाले आवाज़ के साथ हरी बत्ती जलने लगी । मैसेज ओपन किया तो मीरा का नाम स्क्रीन पे फ्लैश हुआ ।

कब तक पहुंच रहे हो , विभूति खण्ड….?? ~ मीरा

बस मैं तो कब से यहां इंतज़ार कर रहा ~ अक्षत

चलो आ रही हूं , अब और इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा ~मीरा

हां , मीरा अब औऱ इंतज़ार करने की हिम्मत मुझमें भी नहीं है वैसे भी दस साल काफी लंबा अरसा होता है ~अक्षत

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