हज़रतगंज की शाम ….! 


~
अब भी वह नन्ही सी जान औऱ मासूम बच्ची बड़े चाव से बिस्किट के साथ चाय पी रहे थे , उनके चेहरे पे जो मुस्कान और आभा की चमक दिख रही थी वो उनके भूख की तलाश और तलब दोनों को बयां कर रही थी ।

औऱ कुछ खाना है तुम लोगों को ~ अक्षत ने पास जाकर पूछा
उनका जवाब भी वैसी ही मुस्कान के साथ मिला , जो शायद अक्षत से यही कह रहा था कि अगर खिला देंगे तो अच्छा ही होगा ।

नहीं नहीं भैया हो गया , देखो मुन्नी भी चुप हो गयी ~ उस नन्ही सी मासूम ने भाई को घुड़कते हुए अक्षत से बोली और भाई को चलने का संकेत दिया

जैसे इतने लाचारी और बेबसी में भी उसका स्वाभिमान दिल के किसी हिस्से में अभी भी मौज़ूद था । तभी तो पहली बार अक्षत को किसी का ‘ इनकार ‘ अच्छा लग रहा था ,क्योंकि इसके पीछे छुपे स्वाभिमान को वो समझ पा रहा था ।

कहाँ हो , मैं पहुचने वाली हूँ ~ मीरा का मैसेज फ्लैश हुआ स्क्रीन पे

बस यहीं चौराहे पे हूँ पहुँचता हूँ दस मिनट में ~अक्षत

चौराहे पे क्या कर रहे ??~मीरा

किसी का इन्तज़ार ~ अक्षत

तब सही जगह खड़े हो , चौराहे पे किसी का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा ~ मीरा

नहीं मीरा , मेरे ज़िन्दगी के चौराहे पे सिर्फ गिने चुने लोग ही हैं ~ अक्षत

अच्छा , अच्छा अब फिलोसोफी मत शुरू करो आ जाओ ~ मीरा

बड़ी जल्दी समझ जाती हो ~ अक्षत

क्या करूँ तुम्हारी तरह इंटेलेक्चुअल नहीं हूं न ~ मीरा

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