पिता ~श्री 


~
महज़ एक शब्द नहीं ,
एक पूरी अभियक्ति हो तुम ।

स्नेह , त्याग औऱ संघर्ष से
कृत इक मुक़म्मल ‘ शक्ति ‘ हो तुम ।

मालूम नहीं कब फिसले थे तुम
पर बहुतों को संभालते देखा है हमने ।

चाहे आधी रात गए वो
सरकारी अस्पताल हो ,
या ब्रह्म मुहूर्त में वो शमशान घाट हो ।

सबके साथ खड़े होते हो तुम ,
आख़िर मुकाम तक ।
फ़िर चाहे ग़ैर समझते हो तुमको या
पराये हो वो हमारी नज़र में ,
सबको देखा तुमने सिर्फ
उनकी इंसानियत की पहचान तक ।

तुम्हीं से सीखा है अभिमन्यु का वो पाठ
तभी तो निर्भीक होकर निखर रहें है।

पर ताज़्जुब होता है खुद पर
कि थे नहीं कुछ भी हम , पर जब से समझा है तुमको ,

बहुत अंदर तक संवर रहे है हम ।

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