हज़रतगंज की शाम ….!

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वैसे तुमने दो स्ट्रॉ क्यों मंगाई , एक से काम चल सकता था ~अक्षत ने नज़रें चुराते हुए पूछा

नहीं , हमें झूठा शेयर करने की आदत नहीं है ~मीरा

आदत नहीं ,या अब छूट चुकी है ~अक्षत

अक्षत ने बचपन मे कई दफ़े मीरा को टिफीन शेयर करते हुए देखा था ,तो पूछ लिया ।उसे क्या पता कि बचपन की टिफ़िन और इस उम्र में किसी से स्ट्रॉ शेयर करने का क्या मतलब होता है ।

नहीं , कोई बात है क्या वैसे भूख लगी होती तो जरूर कर लेती ~मीरा

नवंबर के महीने में शाम के वक़्त का गुलाबी ठंड अक्सर उस खुमार की तरह होता है जो बस चढ़ रहा होता है , कई उम्मीद औऱ आशा लिए ,उस रोज कैफ़े में बैठे अक्षत की भी situation भी बिल्कुल उस गुलाबी ठंड की तरह थी ।

हाँ , मैंने movie के लिए पूछा था तुमसे ,कुछ सोचा ~ अक्षत ने काफी देर से फैली खामोशी को तोड़ते हुए पूछा

नहीं , मैंने देख ली और ऐसे ही हर किसी के साथ मूवी नही देखी जाती , I’m not pleased for everyone ! ~मीरा

हम्म्म्म …..सही है । वो क्या है ना हम D.U वाले हैं ना ज्यादा नाप तौल के नही करते बस दिल किया पूछ लिए खैर अच्छी बेज़्ज़ती की तुमने ~ अक्षत ने सारे जज़बातों को अंदर समेटते हुए बोला

फ़्रेंड है तो इतना हक़ तो बनता है कि अपनी बात हम बिना लाग लपेट के रख सकें ~मीरा

इतने Liberal तो होंगे ही तुम , D.U वाले जो ठहरे ~ मीरा ने तंज भरे लहजे में जवाब दिया

हाँ , मीरा लिबरल ही हूँ , जो पिछले 11 साल से अपनी इस relationship को अकेले मेंटेन कर रहा ~अक्षत

प्यार तुम्हारा है तो ,लड़ना तो पड़ेगा न ,अपने प्यार के लिए लड़ोगे नहीं ~मीरा

लड़ूंगा मीरा , जब तक ईमान ज़िन्दा रहेगा तब तक , क्योंकि काफी कुछ दिया है इस एहसास ने , इंसान बनाया है मुझे ~अक्षत

चलो बाहर चलते हैं ,अंदर काफी ठण्ड लग रही है तुमने कुछ पहना भी नहीं है ~मीरा

सही में बाहर तो काफी राहत है ,अंदर काफी ज्यादे ठण्ड थी ~अक्षत

हां ,और तुम गरम हो रहे थे ~मीरा

वैसे तुम इतनी rude मेरे साथ होती हो या ये तुम्हारा नार्मल है ~ अक्षत

मैं तो नार्मल ही रहती हूं ,बस तुम उम्मीदें लगा लेते हो सो तुम्हें ऐसा लगता है ~मीरा

हाँ , इतना हक़ तो बनता है चलो कोई नही तुम अपने हक़ के लिए लड़ो , मैं अपने हक़ के लिए ~ अक्षत

ये किये न प्योर कम्युनिस्टों वाली बात , इसी बात पे अपनी कविता सुना दो ~मीरा

फिर कभी मीरा ……!

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2 विचार “हज़रतगंज की शाम ….!&rdquo पर;

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