कैन्टीन Cum ढाबा…!


~
इलाहाबाद एक शहर भर नहीं था उसके लिए , ज़िन्दगी को तफसील से समझने का दूसरा नाम था चाहे वो सुधा -चन्दर के वो क़िरदार हो या अल्लाहपुर की पांडेय जी या फ़िर एना हो या मीरा सब ने उसके लिए अपने हिस्से के इलाहाबाद को गढ़ा था ।

उसे नहीं पता था कि वो इनमें से कितने लोंगो में ज़िन्दा था ,पर वो इनमें से हर किरदार को जी रहा था । मीरा उनमें से कुछ खास थी शायद ,तभी तो हमेशा कुछ बाकी रह जाता था उनके बीच और शायद यही कश्मकश आपको एक दिन मुक़म्मल बनाती है ।

आ गए तुम ~मीरा

स्क्रीन पे मैसेज फ्लैश हुआ तो , अक्षत ने पलट कर घड़ी देखी तो रात के 10 बजने को थे ।

हाँ आ गया हूँ ~ अक्षत

कहाँ रुके हो , ~मीरा

यहीं प्रयाग स्टेशन के पास , भैया के यहाँ ~अक्षत

चलो फिर पास में हैं ~मीरा

मतलब आ रही हो मिलने न ~ अक्षत ने लगभग तसल्ली भरे अंदाज़ में पूछा

ऐसा मैंने कब कहा , सो जाओ अब तुम्हारी मोहब्बत सच्ची होगी तो आउंगी ही क्यों ~मीरा

हाँ ले लो मज़े , वैसे भी मुझे नींद आ रही चलो Gud nyt ~ अक्षत

हाँ सो लो जो आ रही है काम से कम वही कर लो , पता नहीं कल नींद आये या न आये ~मीरा

बड़ा मजा आ रहा है ना तुम्हें , सो लेने दो वैसे भी थक चुका हूं ~अक्षत ।

चलो जाओ बक्श दिया ,bye bye ~मीरा

अगले दिन ,

कहाँ हो मैं निकल रही हूं घर से , 9 : 30
तक आ जाना मेरे पास ज्यादा वक्त नही ~मीरा

अच्छा मनमोहन सिंह , मैं 9 बजे तक ही पहुच जाऊंगा फिकर न करो ~अक्षत

अच्छा सुनो प्रयाग में हो तो स्टेशन के पीछे वाले रास्ते से आना , पहली क्रासिंग के बाद ही है IERT ~मीरा

मीरा को अक्सर इन बातों का खयाल रहता कि अक्षत नया है इलाहाबाद के लिए ,सो हमेशा उससे रास्तों के ज़िक्र करना मुनासिब समझती थी ।पर वो भूल जाती की अक्षत के अंदर जो इलहाबाद था उनमे वो खो जाना चाहता था , शायद यही एक पल होता है जिसमें इंसान जितना खोता है उतना खुद को पाता है ।

चलो मोहतरमा मैं आ रहा ~अक्षत 0

आओ , मैं कॉलेज में आ गयी हूँ ~मीरा

अक्षत जहाँ से गुज़र रहा था रेलवे कॉलोनी होते हुए ,उससे कुछ कौंध गया था ,पिछली दफ़े जब एना के पापा को वो लेटर देने आया था तो स्टेशन पे ही मिले थे , तब उन्होंने बोला था यहीं पास के ही रेलवे कॉलोनी के पास रहता हूँ । उन्होंने आने को बोला भी था पर अक्षत ने घर जाने का हवाला दे जाना मुनासिब समझा था , पर अंकल का यूँ पूछना अच्छा लगा था उसे ।

कहाँ पहुँचे ~मीरा

मीरा के मैसेज से उसका ध्यान टूट तो पता चल वो क्रासिंग कब का क्रोस कर चुका

बस आने वाला हूँ ~अक्षत

भाई साहब ये IERT का कैंटीन कहा है ~अक्षत ने गेट पर खड़े गार्ड अंकल से पूछा

अरे वहां क्या पूछ रहे , आओ सीधे में देख रही तुम्हें ~मीरा

तो पहले बोलना था न ,कैंटीन में हो कि बाहर हो ~अक्षत

मैं डिपार्टमेंट जा रही डिग्री लेने तुम कैंटीन में wait करो ~मीरा

कैसी लड़की है ,चलो कोई नही ~अक्षत को थोड़ा अजीब लगा

भैया क्या क्या रखते हो ~अक्षत ने कैंटीन पहुचते ही ढाबे वाला सवाल किया

एक तरीके से उसकी उम्मीदों पर पानी भी फिरा था ,जिस चाव से गार्ड बार बार कैंटीन बोल रहा था अक्षत को तसल्ली हो रही थी चलो अच्छी जगह ही होगी ।पर उसे क्या पता यहां कैंटीन Cum ढाबा वाली सिचुएशन है

अच्छा भैया दो चाय और समोसा कर दो ~अक्षत ने बहुत सोचते हुए ऑर्डर किया

मुझे टाइम लगेगा तुम तब तक बैठो वहीँ पे ~मीरा का ये मैसेज उसके अरमानो पर पानी फेरने की रही सही कसर भी पुरी कर दिया

कहाँ वो सोच के आया था के तसल्ली से मिलेगा ,वहीं अब उसे ये डर था कि ये मुलाकात महज़ औपचारिक न रह जाये

ज्यादे इंतज़ार तो नहीं कराया न, actully लाइट चली गयी न सो सब स्टाफ बाहर आ गया था सो लेट हुआ , कहो क्या खाओगे ~मीरा ने आदतन मेहमान नवाजी में पूछा

ऑर्डर कर दिया है समोसे और चाय का कुछ और करना हो तो बोल दो ~अक्षत

अरे यहां का कटलेट अच्छा होता है रूको ~मीरा

दादा , दो कटलेट कर देना , पैसा बताओ चाय समोसे ,और कटलेट का ~मीरा

तुम क्यों पेड करोगी ,मैं दे रहा न ~अक्षत

नही अभी आप मेरे शहर में ,तो मेहमाननवाज़ी मेरी तरफ से ~मीरा

Wow , ये वही Rude meera है विश्वास नही हो रहा ~अक्षत

अरे खुश मत हो , हम कभी दिल्ली आए तो वसूल लेंगे सब ~ मीरा

मोस्ट वेलकम , तहे दिल से आपका स्वागत है ~अक्षत

अच्छा सुनो ज्यादा टाइम नही है मैं आधे घण्टी में निकल जाऊंगी , मम्मी का कुछ काम भी करना है मार्किट से ~मीरा

इतनी जल्दी ,कुछ देर और रुक जाओ ~अक्षत ने काफी उम्मीद से पूछा था

बोलो अभी तो हूँ न कहो ~मीरा

नही कुछ कहना नहीं है , बस तुम ऐसे ही कुछ भी बोलती रहो ~अक्षत

बडे अजीब हो जब कुछ कहना नहीं फिर क्यों रोक रहे हो ~मीरा

ठीक हैअच्छा जैसा तुम्हें सही लगे ~अक्षत मीरा को ये कैसे समझता कि यही पल जीने तो वो इतनी दूर आया था

अच्छा चलो रुकती हुन थोड़ी देर ~मीरा

घर पे सब लोग कैसे हैं ~अक्षत ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया

बढ़िया ,तुम बताओ दिल्ली की आज ही ट्रेन है ~मीरा साथ निभाते हुए पूछा

हाँ , ~अक्षत की दिलचस्पी मीरा को देख भर लेने में ज्यादे थी , फिर मीरा का सवाल मसलन चाहे जो भी हो

यही होता है पहली या बचपन वाली मुलाकात में ।

सुनो अब चलू मैं काफी देर हो रही ~मीरा

नहीं , थोड़ी देर और ~इस बार अक्षत ने हौले से मीरा का हाथ पकड़ते हुए बोला

मीरा अक्षत से नज़रे हटा न सकी

तुम क्यों करते हो ऐसा , जैसा तुम सोचते हो ऐसा नही होता ~मीरा ने उसके हाथों पे हाथ रखते हुए बोला

क्या नही होता , कुछ न बोलो बस शांत होकर इस खमोशी को समझो सारे सवालों के जवाब इसी खामोशी में है मीरा ।

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7 विचार “कैन्टीन Cum ढाबा…!&rdquo पर;

  1. अपके लेखन में इतनी चसक है कि ऑंखें अगली कड़ी को ढूंढने के लिए आतुर हो जाती हैं..😊 बोहोत ही प्रभावी और रोचक कहानी है ये कैंटीन cum ढाबा। मेरी शुभकामनयें आपको।

    Liked by 1 व्यक्ति

    1. नि संदेह एक पाठक ही किसी लेख का सार्थक होना तय करता है। उसे पसंद या नापसन्द करके और यही बात उस लेखक के लिए प्रेरणा होती है।

      Liked by 1 व्यक्ति

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