इंतज़ार ….!


~
Hey ….Kaisi ho ??~अक्षत

Badiya .. you said ??~ मीरा

As usual fyn(fine) ….~अक्षत

अरे ओ भाई साहब ट्रेन चल दी , चलना नहीं है । पास ही खड़े आदमी ने जब आवाज़ लगाई तो उसका ध्यान मैसेज बॉक्स से हटा , जिसमे वो पिछले कई मिनटों से कुछ लिख लिख कर मिटा रहा था । दरअसल वो ये तय कर नही पा रहा था कि उसे ये बताये या नहीं कि वो फिर से इलहाबाद आ रहा था एग्जाम देने ।

अगले पल जब ध्यान टूटा तो ट्रेन में चढ़ चुका था , पर अभी भी तय नहीं कर पा रहा था कि वो अभी बताये या पहुँच कर ।

नहीं सरप्राइज जैसा कुछ नहीं था , बस वो खुद के जज़बातों से और उसके जवाब से डरा हुआ था ,हालांकि पिछली दफ़े जब पुछा था तो उसने क्लोजिंग वीक बता कर मना कर दिया था , पर ऐसा नही था कि अब तक उसके बुलाने पे वो आई न हो पिछले 3 सालों में दो दफ़े मुलाकात हो चुकी थी उनकी पर अब भी सब कैसुअल ही था उनके बीच ।

Kya hua koi baat ya aise hi massege kiya~ मीरा

मीरा का मैसेज स्क्रीन पे फ्लैश हुआ तो , समझ नहीं पाया क्या टाइप करें , सो मोबाइल ऑफ करके बैग में रख दिया ।

आप अकेले हो या कोई साथ है ~पास खड़े बुजुर्ग अंकल ने आवाज़ लगाई

नहीं …अकेले बताइए ~अक्षत ने उसी तहज़ीबी अंदाज में पुछा

नहीं अगर प्रॉब्लम न हो तो सीट शेयर कर लें मैं सिर्फ कानपुर तक ही जाऊंगा ~अंकल ने तशरीफ़ रखते हुए फरमाया

नहीं कोई बात नहीं बैठिये आप दिन का सफर है सो क्या दिक्कत होगी ~अक्षत

हां वैसे शुक्रिया ….क्या करते हैं आप ~अंकल ने बातों का सिलसिला शुरू करने के लिहाज से कुछ औपचारिक सवाल किए पर जवाब में सिर्फ हां , न पाकर समझ चुके थे कि लड़का कहीं और है अभी सो शांत रहना ही मुनासिब समझा

बहोत देर हो चुकी थी , अभी भी वो इसी उलझन में था कि क्या कहे । फिर याद आया कि 8 घंटे का सफ़र है सो बेहतर हो इस मसले को वो इलाहाबाद में ही चलकर सुलझाए । फिलहाल तो किशोर कुमार के गाने सुन ले , सो मोबाइल को ऑन कर उसने गाना प्ले किया और उधर मैसेज बॉक्स में जवाब में टाइप किया ,

Nahi bas aise hi …~अक्षत

ह्म्म्म….~ मीरा

पिछले दो घंटे से जिस उलझन में था ,किशोर दा के गाने कुछ राहत दे रहे थे । वर्ना सुबह के वक़्त में ट्रेन के स्लीपर क्लास का सफर काफ़ी हलकान कर देने वाला था ।

दो घंटे बाद , जब उसकी नींद खुली तो पता चला कि ट्रेन फतेहपुर क्रॉस कर चुकी है बस एक आध धण्टे में ट्रेन इलाहाबाद पहुचने को थी , पता ही नहीं चला उसे कब वो कानपुर के वेट करते करते इलहाबाद पहुचने को था ।

ट्रेन गांव के उन मनोरम नज़ारो को समेटे चल रही थी जिसमे अक्सर अक्षत अपने मन मुताबिक कहानियां गढ़ता चलता था , ये उसकी बचपन की आदत थी जब भी वो ट्रेन से मम्मी संग नानी के यहां जाता तो अक्सर ऐसे ही खेत खलिहान , तालाब जैसे नज़ारे देखने को मिलते थे , तब से उसकी आदत सी हो गयी थी ,इन नज़ारों में दुब जाना । आज भी वो यही कर रहा था , कुछ किस्से भी गढ़ लेता था वो और उनमें जीने लगता।

खेत खलिहान जब खत्म हो ,पुल सड़क नाले और ऊंची बिल्डिंगें दिखने लगी तो लगा अब शहर आ चुका है इलाहाबाद , क्या यही पहचान थी उस शहर की उसके ज़ेहन में , पता नहीं पर ये गालियाँ -पुल और सूबेदारगंज का स्टेशन उसको बताने के लिए काफी था की जिस शहर को वो चला था शायद ये वही शहर था ।

उतरते ही उसने अपने भइया को आदतन फ़ोन किया ~

हां मैं थोड़ी देर से आऊंगा ट्रैन अभी आउटर पर खड़ी है ~अक्षत ने झूठ बोला

हां ठीक है आराम से आओ , सुनो आउटर पर मत उतारना वहां से मुश्किल होगी और बैंक रोड की ऑटो ले आना फिर वहां से अल्लाहपुर लेबर चौराहा उत्तर जाना ठीक और कोई दिक्कत हो तो फ़ोन कर लेना ~भइया

हां ठीक है ~जवाब में उसने औपचारिक सहमति ज़ाहिर कर सिविल लाइन के हनुमान मंदिर चल दिया ।

पहली बार जब अपने पाप के साथ आया था तो ,शाम के वक़्त पापा के साथ बड़े चाव से यहां आया था , खैर बजरंग बली और पापा दोनों लोगो से उसका रिश्ता कुछ ऐसा ही था कि जब भी वो उलझन में हो तो सिर्फ़ इन दो लोगों को याद करना मुनासिफ समझता था । जवाब भी उसे शायद इन्ही दो लोगों से मिलता ।

पर आज किसी जवाब के लिए नहीं आया था , बल्कि खुद के सवाल समझने थे उसे जिसका जवाब शायद उसी के पास था ।

मंदिर में आधे धण्टे हो चुके थे , अब तक काफी शांत हो चुका था । तभी भैया का फ़ोन आया

Kahan pahuche ~ भैया

हां बस सिविल लाइन हुन मैं ~ अक्षत

चलो फिर , मुझे लेबर चौराहा आना पड़ेगा या चले आओगे ~भैया

नही एड्रेस आप सेंड कर दीजिए एंड आस पास का लैंड मार्क मैं आ जाऊंगा ~अक्षत

ठीक है ~भैया

Hey ….Kahan ho ~अक्षत ने मीरा को मैसेज करते हुए पूछा
उसे लगा शायद भैया के रूम पे बात न हो सके सो एहतियातन मसेज सेंड कर दिया

अब उसे इंतज़ार था तो उसके जवाब और कल के दोपहर का , जब का उनसे मिलना उसने सोच रखा था ।

#yqbaba#yqdidi#yqbhaijaan#yqtale#इन्तज़ार#

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