इंक़लाब ज़िंदाबाद

‘ इंक़लाब – ज़िंदाबाद ‘

‘ ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने की ऋतु रोज़ आती नहीं ,
हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे ,वोजवानी जो खूं से नहाती नहीं । ‘
( फैज़ अहमद फैज़ )

‘ इंक़लाब-ज़िंदाबाद ‘ हसरत मोहानी के दिये ये शब्द आज भी जब हम कहीं दुहराते है तो एक गुब्बार पैदा करते हैं ये हमारे उन तमाम चुप्पियों के ख़िलाफ़ जिसको हम बेवज़ह सहन कर रहे होते है ।
शायद आज भी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के पुराने साथी ( चंद्रशेखर आज़ाद शचीन्द्रनाथ सान्याल , जतीन्द्रनाथ दास ,अशफ़ाक उल्लाह खां , राजेन्द्र लहिरी, रौशन सिंह , राम प्रसाद बिस्मिल ) हों या HSRA ( हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ) के साथी चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह ,सुखदेव थापर ,राजगुरु , बटुकेश्वर दत्त , भगवतीचरण वोहरा , शिव वर्मा ) इन सब की चेतना का परिचायक है ये नारा ‘ इंक़लाब – ज़िंदाबाद ‘ ।

बचपन मे जब कभी भी स्कूल में हमारे गांधी जयंती हो या सुभाषचंद्र बोस की या फिर शहीद दिवस इन सब मौकों पर भगतसिंह , सुखदेव ,राजगुरु इन सब की मूर्ति भी होती पर चर्चा सिर्फ गांधी , सुभाष चंद्र बोस या बहोत होता तो चंद्रशेखर आज़ाद पे कर लेते , इन क्रांतिकारियों की तस्वीर मानो सिर्फ जगह भरने के लिए रक्खी गयी हो । मन में हमेशा एक कौतूहल होता कि इनके योगदान को हम क्यों नहीं याद करते या प्रेरणा लेते , या ये सिर्फ़ जगह भरने वाले लोग थे ।
इतिहास की विडंबना यही है कि ये हमेशा दावा करता है कि हम आपको सच दिखलायेंगे पर , पर किसके हिस्से का शायद ये वो बताना भूल जाता है , अगर हमें इन क्रांतिकारियों को याद रखना है तो इतिहास को भूलना होगा । क्योंकि जिस तरीके का इतिहास हमें स्कूल , कॉलेज या विश्वविद्यालय में सिखाया गया वो हमारे हिस्से के सच से महदूद ही रहा ।

” अगर हमको अपने हिस्से के सच से वाकिफ़ होना है तो हमें अपने हिस्से का इतिहास भी ख़ुद ही गढ़ना होगा । ”

आज जब मैं ये लेख लिख रहा , उससे दो दिन बाद हमारा पूरा देश शहादत में डूब जाएगा । ट्विटर से लेकर फेसबुक ,इंस्टाग्राम
सब पर तरह तरह के शायरी , अपने हिस्से वाला इतिहास साझा किया जाएगा और कमी रह गयी तो कहीं कहीं राजनीतिक पार्टियों द्वारा संगोष्टि भी कर ली जाएगी , उनमे भी संगोष्टि का शीषर्क क्रांतिकारियों के त्याग को लेकर नहीं बल्कि माननीय महोदय मुख्य अतिथि के हिसाब से तय किया जाएगा , ताकि उनको बोलने में असुविधा न हो । और मैं भी इस परिपाटी से अलग थलग नहीं हूं जो उनके शहादत पर लेख लिखकर कोई महान काम कर रहा ।

यही समस्या है हमारी की हम हमेशा अपने आदर्श , अपनी प्रेरणा ऐसे किसी चमत्कारी पुरुष में ढूंढते है जिसके याद कर लेने भर से
या उसके प्रभाव भर से हमारा जीवन धन्य हो जाये । तनिक भी ये नहीं सोचते कि क्या होता अगर उस आदर्श पुरुष ने भी यही सोच होता ???

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सिर्फ और सिर्फ आप के पास है , कोई दूसरा आपके सवालों का जवाब कैसे दे सकता है । हमें अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी होती है , क्योंकि आपके इस सफ़र में आप एकलौते हमसफर होते हैं जो अपनी हर परिस्थिति से वाकिफ़ होता है बाकी सब तो महज़ एक क़िरदार है ।

यहाँ पर हमारी कोशिश ये तनिक भी नहीं आपको मुफ्त के इतिहास से अवगत कराएं , चाहते तो हम भी , सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” प्रकाशित की थी उनका ज़िक्र कर सकते थे या फिर ‘ मैं नास्तिक हूँ ‘ नाम के उस लेख का जिसमे भगत सिंह ने इंसान की अकर्मण्यता और ईश्वरीय भक्ति के दिलचस्प रहस्यों का ज़िक्र किया या फिर प्रोफेसर चमन लाल के उन तमाम शोध लेखों का जिनमे वो बताते हैं कि भगत सिंह महज़ क्रांतिकारी नहीं बल्कि एक विचारधारा के तौर पर ज्यादे व्याप्त हैं , या फिर कलाकार , रंगकर्मी पीयूष मिश्रा की लिखी पुस्तक ‘ गगन दमामा बाज्यो ‘ जिसमें वो भगत सिंह के उस व्यक्तित्व का ज़िक्र करते है जो ‘ मैं एक नास्तिक हूँ ‘ जैसा लेख भी लिखता है वही दूसरे अपनी जेब में गीता , विवेकानंद की किताब भी रखता है । इन तमाम अनुभवों से जब आप ख़ुद गुजरेंगे तो ,तब शायद आपको वो भगत सिंह मिलें जिसकी आपको तलाश है ।

क्या आप अपने ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा ,उन क्रांतिकारियों को समझने में, देने को तैयार हैं जिनकी सोंधी खुशबु आज भी उस आज़ादी में मेहकती है जिनमे हम और आप ज़िन्दा है , या फिर आप भी उस इंसान की तरह हो चले हैं जिसका जिक्र पाश ने अपनी इस कविता में किया है ।

~ ‘ मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती ,
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ,
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना ।
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना ।
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना ।
सबसे ख़तरनाक होता है , हमारे सपनों का मर जाना ।

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2 विचार “इंक़लाब ज़िंदाबाद&rdquo पर;

  1. ज़िन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर जान देने की ऋतु रोज़ आती नहीं ,
    हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे ,वोजवानी जो खूं से नहाती नहीं ।
    bahut hi khubsurat panktiyan padhne ko mili ….bahut khub.

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