कविता…! जब तुम बन जाती हो 


उस रोज नया पल होता था , हम जगते थे तब जब सब सोता था

सिरहाने से पड़ी अपनी वो पीली चादर हटाकर , बगल में रख देते थे ,
जब चुपचाप से घड़ी में कुछ देखते होते थे ।
अचानक सहम कर बैठ जाते , वक़्त की आवाज़ से कुछ इस कदर डरे होते थे ।

फिर बाहर उठ चल देतें , जहां अपना सा कोई बहुत पहले उठा हुआ है ,
जो धुंध की शक्ल में आसमान में अबतक जमा हुआ है ।

दूर से आती आवाज़ ये तसल्ली दिए जाती , मैं अकेला न था उस सुबह ये खुशफहमी यूँ ही पल जाती ।

उठकर टहलने की ज़िद में हम नींद को भी बहलाया करते थे ।
फिर पानी पिया , नित्य क्रिया सब यूँ ही हो जाया करते थे ।
पैरों में स्लीपर पहनु या जूता ये सोचने में मिनटों लगाया करते थे ।

बाहर निकलते ही जब ठण्डी सिरहन हमको छूती थी ,
क्यों निकल आये हम अभी ये बात हमेशा कचोटती थी ।

फिर हौसला होता एक नई सुबह का , नई फ़िज़ा का उसके रंग में ढल जाने को ,
और मिलेंगे वो बुज़ुर्ग अंकल रोज की तरह मुस्कुराने को ।

फ़िर हम चल पड़ते उस ओर जहां , नया सबेरा होता था ,
थी ये वही जगह जहां पुराने परिंदों का बसेरा होता था ।

कुछ बात नई , अंदाज़ नई , सब हसमुख चेहरे होते थे ,
कभी 20 तो कभी 40 तो कभी 60 तो कभी 70 हर उम्र के क़िस्से होते थे ।

कभी गुप्ता आंटी ,तो कभी माथुर साहब तो कभी वो अपने आफिस वाला नया क्लर्क ,हिसाब सबका होता था ।
जब तक हम अपनी कहानी में इनके क़िरदारों को गढ़ रहे होते थे ।

तीन से चार , चार से पांच और फिर पूरे आठ चक्कर हो जाते थे ,
हम तब भी उन कहानियों से निकल नहीं पाते ।

अच्छा बेटा हम चलते हैं ये सुनकर ही हम जाया करते ।
कल फिर मिलेंगे अंकल ये हम रोज़ उन्हें सुनाया करते ।

लौटते वक़्त ये ढाँढस हमको भी बंधता था , मिलेंगें वो फिर वहीं ,जहाँ पुराने परिंदों का बसेरा लगता था ।

To be continue ……

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2 विचार “कविता…! जब तुम बन जाती हो &rdquo पर;

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