बचपन की बयार 


वो अड़हुल का पेड़ , वो कनैल की डाल
याद आती रही वो बचपन की बयार ,

कभी मिट्टी वाली गाड़ी तो कभी पलास की झाड़ ,
गढ़ते थे जिनमें हम अपने सपनो की वो आस ।

कभी मिट्टी के घरौंदे , तो कभी ईंटे का वो मकान ,
बुनते थे जिनसे हम अपने कल की बुनियाद ।

कभी झगड़ा तो कभी लड़ाई , तो कभी छुपन -तो कभी छुपाई
ऐसी ही थी हमारे रिश्तों की रुसवाई ।

फिर धीरे धीरे हम बड़े हुए , एहसास थे अब भी वहीं पर शायद हम कहीं और खड़े हुए ।

आज जब भी वो घरौंदा हमें दिख जाता है ,
कौंधता है वो बचपन फिर से कहीं जहन में , की ‘ आज ‘ एक पल को कहीं मिट जाता है ।

फिर चलती है एक बयार , जो बचपन को लिए है साथ ,
और धुंधली यादों का एक बसेरा लगता है ,

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