इक ख़त है जो तुम्हारे नाम

लिख रहा हूँ ,
कुछ नहीं बस एहतराम लिख रहा हूँ ।

बहुत दफ़े लिख ली अपनी मोहब्बत ,
इस दफ़े बस अपनी वो रात लिख रहा हूँ ,

उस रात में बीती एक याद लिख रहा हूँ ।

ख़्वाहिश उम्मीद और मुलाकात
सब कुछ था उसके हिस्से में सुबह जब नींद टूटी तो बिखरे पड़े थे ,
सब ख़्वाब चंद कोरे कागज़ के क़िस्सों में ।

ताज़्जुब ही था जो इनकार भी न था
अबकी उसके हिस्से में ।

एक ख़त है जो तुम्हारे नाम लिख रहा हूँ …!

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11 विचार “&rdquo पर;

    1. बहुत खूब …आज इन मुक़म्मल अल्फ़ाज़ों से ,
      ग़ैरों के उनवान लिख रहा हूँ ।
      वक़्त रहते जो कह पाया कभी न
      आज उन्ही गुज़री बातों के चंद अशार लिख रहा हूँ ।

      Liked by 1 व्यक्ति

      1. वो मोहब्बत का इज़हार लिख रही हूं
        तुम पर वो ऐतबार लिख रही हूं
        कुछ बिखरे हुए ख्वाब़ लिख रही हूं
        कुछ अधरे अल्फ़ाज़ लिख रही हूं।

        Liked by 2 लोग

      2. अरे वाह।क्या खूब कहा।
        हमें भी अपने साथ रहने दो,
        अम्बर में मत बिठाओ,
        अगर कोई भूल हुई तो माफ करना,
        धरती से मत हटाओ,
        अगर हम सितारे तो आप भी मेरे साथ हैं,
        इस कदर हमें आसमान मत दिखाओ।

        Liked by 1 व्यक्ति

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