माँ , जलेबी और फरुखाबादी 


पार्ट ~2

अबतक पराग के फ्लैट पे आये अक्षत को एक घंटे हो गए थे , और तब तक वो उसके फ्लैट के interior को समझ रहा था , यही कोई शाम के 7 बजने को थे , ठीक ढलती शाम के बाद वाला वक़्त जो दिन के गुज़र जाने की मुकम्म्मल गवाही देता है ।
पता नही ढलती शाम का असर था या अंधेरे का , या उसके दीवारों के कलर का उसका रूम काफी डार्क लग रहा था ,हमेशा लाइट कलर पसंद करने वाले , ग्रे हो चुकी ज़िन्दगी में अक्षत को अब क्यों डार्क अच्छा लग रहा था , ये वो भी नहीं जानता था ।

क्या हुआ , तुम इतने शांत क्यों हो गए ~ पराग , ने कबोर्ड में अपने कपड़े तह करते हुए पूछा

नही , बस तुम्हारे घर के वास्तु को समझ रहा था , काफी अच्छे से मेन्टेन कर के रखा है ना तुमने ~ अक्षत

वास्तु तो नही पर हां एक सीक्वेंस मिलेगा तुम्हें चीजो में ,हर रूम को अलग अलग थीम दिया है ~ पराग

तुम प्रोफेशनल कम , दिल के ज्यादे आर्टिस्ट्स हो जो हर जगह में एक नयापन ढूंढ लेता है ~ अक्षत ने पराग की तारीफ में कुछ कसीदे गढ़े

मिया हमने तो बस चीजो को एक सीक्वेंस मे रख दिया था , ये तो देखने वाले की खासियत है कि इनमें वो क्या ढूढता है ~ पराग

संभावना …..~ ये शब्द पराग के मुंह से मानो ऐसे ही निकल पड़ा

वेल सेड , ज़िन्दगी भी तो ऐसी ही होती है न , फिर चाहे उसके शेड कितने डार्क क्यों न हो हम उनमे संभावना ढूढ ही लेते हैं ~ पराग ने फिलॉसॉफिकल लहज़े में जवाब दिया

ह्म्म्म दोस्त ….देखो कुक आ गया तुम्हारा ~ अक्षत

जबतक पराग कुक को शाम के खाने का समझा रहा था , तबतक उधर अक्षत तफ़सील से एक एक कर पराग के गांव थीम वाले कमरे को निहार रहा था , उन तमाम फ़ोटो को जिन्हें पराग अक्सर गांव के दृश्य के तौर पर अपने फ़ोन के गैलरी में सेव कर रखा था वो अब दीवारों को एक नया आयाम दे रही थी ।

क्या देख रहे ….., देखो ये वही फ़ोटो है जो हमने गंगा माई के पूजा के वक़्त लिया था ~ पराग ने आते ही बड़ी उत्सुकता से एक एक कर उन तमाम फ़ोटो का ज़िक्र करना शुरू कर दिया

और ये तो मेले वाली होगी न , बड़ा नोस्टैल्जिक है ~ अक्षत भी अब उसके गांव और मेलों की दुनिया मे शामिल हो चला था

यही एक लम्हा होता था उनकी दोस्ती का , जिनमे दोनों को रहना अच्छा लगता था , गांव के किस्से , गांव की बातें और सबसे ज्यादे माँ की यादें , अब मसला चाहे माँ के पैरों में लगे आलता का हो या उनकी साड़ी की पल्लू का या फिर उनके धनिये वाली चटनी का सबका ज़िक्र वो दोनों बड़ी बारीकी से करते थे ।

वैसे तभी तुमने उमराव जान के सवाल पर कुछ बोला क्यूँ नही ~ अक्षत ने बातों के दरमियां धीरे से उमराव जान वाली बात रख दी

अचानक बीच मे उमरावजान कहाँ सेआ गयी ~ पराग

उमरावजान तो हमेशा बीच मे ही आयी थी दोस्त , अब चाहे मूवी हो या फिर किसी की ज़िंदगी ~ अक्षत

नहीं दोस्त , उमरावजान नहीं बल्कि लोग उनकी ज़िंदगी के बीच आए थे ~ पराग ।

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