इक याद साझा किए देता हूँ ..!


यूँ तो आपसे जुड़ी बातों का हर लम्हा , ज़ेहन में कैद हो चुका है पर पिछली दफ़े जब लगभग 9 साल बाद आप दोबारा हमे छोड़ने को मिर्ज़ापुर रेलवे स्टेशन पे आये तो , एक बार फिर से यादों का जखीरा सामने आ खड़ा हुआ । और ये फोटो उसी वक़्त चुपके से ली हुई उन्ही यादों की तस्कीन करती है ।

हां ये वही यादें है जिन्हें मैं ताउम्र सहेजे रखूंगा , यूँ तो बहोत कम ही ऐसे मौके रहे जिनमे आपने हमे यूँ इस कदर छोड़ने की तकल्लुफ़ उठाई , नही कारण ये नहीं कि आपका मन नही था , बल्कि आपके पास समय न होते , तभी तो उस रोज जब आप छोड़ने आये न तो एक अजीब सा एहसास हो रहा था , बिछड़ने का । ये वही एहसास था जो 9 साल बाद फिर से दस्तक दे रहा था , कुछ वैसे ही , जैसे तब दे गया था । तब तो पहली बार घर से बाहर जा रहा था पढ़ने को आपकी सहुलियत और मम्मी की फ़िक्र लिए , और तब तो कोई ख़ास दूर तो नहीं जा रहा था ,पर शायद बिछड़ने का वो एहसास बहुत लंबा रह गया , जिसे मैं आज तक मिटा न पाया ।

और आज एक बार फिर से वही दूरियां वक़्त के साथ लंबी हो रही थी , पता है जब तक स्टेशन पे ट्रेन न आई थी मैं बड़ा सुकून से साथ खड़े सोनू ड्राइवर से बात किये जा रहा था , पर जैसे ही ट्रेन आकर प्लेटफॉर्म पे खड़ी हो गयी न , मन बदलने लगा था मेरा
लगा कोई बहाना कर लूं बोल दूँ आज नही जाना , पर समय की यही पाबंदी होती है जो अक्सर रिश्तों के बीच आकर खड़ी हो जाती है । आपसे कहना चाहता था कि आपको यूँ छोड़ जाना हमें अच्छा नही लग रहा था , और फिर जब आप प्लेटफॉर्म पे खड़े हो मेरी कोच की खिड़कियों की तरफ देखने लगे न तो मैंने जानबूझकर नज़रे घुमा ली थी , क्योंकि इतनी हिम्मत न थी मेरे अंदर की आपको यूँ जाता हुआ देख सकूँ ।

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