शहर ….कुछ आपका , कुछ हमारा !


सब एक पल को ख़ामोश , किसी को माई के ऐसे कटु वचन का भान न रहा , तभी मिशिर गुरु ने खामोशी तोड़ते हुए पल्लगी ( नमस्कार) की ।

नहीं माई अइसन काहे कहत हो , औरत तो दुर्गा का रुप होत है ~ मिशिर गुरु ने माई के उम्र का लिहाज़ करते हुए माहौल को नरम बनाने की कोशिश की

रामजियावन बचवा , ए समाज उ दुर्गा को का कभी अपनावत है बताओ । औऱ जब राजा राम का प्रजा सीता को न अपना पाई तो ए त कलजुग है और हमार गांव के लोग~
इस बार माई ने बेहद संजीदा सवाल किया था मिशिर से

माई , ई त उनकी महानता रही न कि एक धोबी के आरोप के भी उ अपने प्रजा का आवाज़ समझने , और राजतंत्र में राजा त प्रजा के प्रहरी होला न माई ~ करीम चाचा

इहे त अंतर बा करीम ए समाज के सोच में की राजा राम क त्याग दिख जाला , पर सीता के त्याग के ए समाज हमेशा कटघरे में खड़ा करत है ~माई ने इस बार उनकी समझ को झकझोर दिया था ।

माई के अब प्रवचन करे के चाही , वैसे भी इ उमर काम करे क नाहीं बा ~ माई के चले जाने के बाद कल्लू मियां ने धीरे से अपनी बात रखी , ये ध्यान में रखते हुए की कहीं माई सुन न ले ।

बात त सही हौ कल्लू ,पर का गांव के लोग सुनिह माई का बात ~ करीम चाचा

काहे हो करीम , काहे न सुनिह लोग अगर बात सही हौ त सब सुनी भी और मानी भी ~मिशिर गुरु

समाज बदल गल हो मिशिर , सही त सब कहेला अपने हिसाब से पर , पर। गांव समाज मे त सब केवल पंडित जी और मौलवी लोगन के सुनेला ना ~ करीम मिया

अपने बोलने में कुछ ज्यादे बोल गए , इस बात का अंदाज़ा उन्हें मिशिर गुरु की असहजता से लगा

नाहीं हो करीम , ई समाज सब समझेला बात कोई कहे और कितनो खरी कहे अगर बात सही ह त सब तवज़्ज़ो देही , ई उहे समाज बा जऊन केवट के भी याद रखलेस और सबुरी के भी ~ मिशिर गुरु

अरे ये करीम चाचा रहेदा नाहीं त आधा रामायण माई समझा के गइल और आधा ई मिशिर समझाई दिहन ~ कल्लू मियां

भोसड़ी के तोयं न सुधरबे , चाय बनल की नाही ~ मिशिर ने अपने चिरपरिचित मिज़ाज़ में बोले

अक्सर मिशिर गुरु गाली तभी देते जब उनका कोई बेहद करीबी हो , या गावँ समाज के चलन के हिसाब से प्यार – अपनापन दिखाने की ये एक परंपरा सी थी ।

चाय लेहीं मिशिर जी ~ कल्लू आदतन पहले मिशिर गुरु को चाय की चुक्कड़ पकड़ाते फिर करीम चाचा को ।

औऱ फिर मिशिर अपनी चाय ,करीम चाचा को देते । और उनका चाय खुद मिशिर गुरु ले लेते । शायद ये उनकी दोस्ती की सहूलियत थी , तभी मुंह पे भले ही करीम चाचा को वो कुछ कह ले पर मज़ाल था कि उनके अलावा करीम चाचा को कोई और कुछ कहे । मिशिर आड़े हांथो ले लेते उसे ।

यही तसव्वुर होता है हमारे ताल्लुक़तों का की सब पीछे छूट जाते हैं धर्म -मजहब ,जाती ।
और कुछ रह जाता है तो वो एहसास जिनके दरमियां हमारे रिश्ते पनपते हैं ।

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