अनोखे ~ रिश्ते 


उस रोज़ दोपहर अब ढलने लगी थी धीरे-धीरे ठीक वैसे ही जैसे शाम अपनी मुंडेर पर चढ़ने को आतुर दिख रहा था ।

यही कोई दिन को 3 बजने को थे , अक्षत अबतक अपनी जगह कि तलाश में उस सुनसान कोने से लेकर उस ओपन हाउस वाले लॉन की तरह दिखने वाले कैफ़े के स्टाल , उसके सामने पड़ी बेंचो और उस बबुल के पेड़ की नीचे पड़ी पटिया से होता हुआ न जाने कहाँ -कहाँ हो आया पर हर जगह आस पास बैठे लोगों की चिट-चैट से परेशां हो उठ चल देता ।
फ़िर उसने ये तय किया कि वो अब पेड़ के नीचे पटिये वाली जगह पे ही बैठ कहानी को पूरी करेगा ।

कुछ भी कह लो गुरु , और जगह से तो मस्त ही है ये जगह ~ अक्षत मन ही मन बुदबुदाया

अरे u know na , my sister-in-low quit her job yesterday ~ पास बैठी ऑन्टी ने अपनी ये बात जब अपने दोस्त से की तो , अक्षत के लिए मुश्किल हो गया ये पता लगाना की उनको इस बात का दुख था या ग़म

This is so sad yaar ~ पास बैठी उनकी दोस्त ने काफ़ी गभीरता से हामी भरी ।

पता नही दिल्ली वाले habitually अंग्रेजी बोलते है या टशन में ये बात आज तक समझ नहीं आयी ।

अक्षत अब तक अपनी कहानी भूल ऑन्टी के शरलॉक होम टाइप क़िस्सों में ग़ुम हो गया , तभी अचानक उनके पास बैठी दोस्त से जैस ही अक्षत की नजरें मिली , वो असहज हो उठा , जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी गई । मोहतरमा ने हल्की मुस्कान से साथ नज़रें हटा ली , और फिर वो तल्लीन हो चली अपने दोस्त के क़िस्सों में ।

इधर अक्षत अपनी कहानी के लिए जिस प्लॉट का इंतज़ार कर रहा था , वो खत्म हो चला । थोड़ी देर पहले हुए वाकिये से उसके ज़ेहन में कुछ कौंध गया था ।

‘ कहानी ‘

आप ऐसे क्यों देखते हैं हमें ~ पूजा ने अक्षत से नज़रें हटाते हुए बोला

नहीं बस ऐसे ही , काफी दिन बाद मिल रहा न ~ अक्षत , उसकी निगाहें अभी भी वहीं थी

कह तो ऐसा रहें हैं जैसे हम बिछड़ गए थे ~ पूजा

हम्ममम्म , तुझसे न मिल पाना बिछड़ना ही तो है ~ अक्षत

नहीं बिछड़ने वाले कभी मिलते कहाँ है ~ पूजा की आवाज़ में अबकी भारीपन था

हम्ममम्म बात तो सही कही पर , तू इतनी गंभीर क्यों है ~ अक्षत

क्यों मैं गंभीर नहीं हो सकती क्या ~ पूजा

लग तो नहीं रहा है ~ अक्षत ने तंजिया अंदाज में कहा

अच्छा , तो गंभीर होने के लिए गंभीर लगना ज़रुरी है ~ पूजा

मतलब हर बात में तर्क ज़रूरी है ~ अक्षत

अब आप ही तो कहते हो कि पढ़े लिखे इंसान को हर बात यूँ ही नहीं मान लेनी चाहिए ~ पूजा

हां पर , जहां सवाल अपनों का हो न वहां हर बात यूँ ही मान लेनी चाहिए ~ अक्षत

क्यों अपनों से तर्क नहीं हो सकता क्या ..? ~ इस दफ़े पूजा की नजरें सवाली थी

हम्ममम्म….. पता नहीं ~ अक्षत

पर हमने तो अपनों से अक्सर तर्क ही किया है ~ पूजा , इस दफ़े पूजा की निगाहें अक्षत पर थी ।

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